जी को रोग लगा बैठा जी के रोग से मरता हूँ
इस में किसी से शिकवा क्या अपनी करनी भरता हूँ
तर्क-ए-गुनाह ऐ वाइ'ज़-जी दिल से नहीं मजबूरी है
आप ख़ुदा से डरते हैं मैं दुनिया से डरता हूँ
दुनिया से कुछ फ़ैज़ न था दुनिया को तज बैठा हूँ
अल्लाह से उम्मीदें हैं अल्लाह अल्लाह करता हूँ
दूर तो हट जाऊँ लेकिन फ़िक्र-ए-मोहब्बत ने मारा
बेहद नाज़ुक रिश्ता है टूट न जाए डरता हूँ
काविश-ए-पैहम आख़िर तक हासिल-ए-मर्ग-ए-मायूसी
ये भी कोई जीना है किस जीने पर मरता हूँ
ग़ज़ल
जी को रोग लगा बैठा जी के रोग से मरता हूँ
हरी चंद अख़्तर

