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जहान-ए-दिल में हुए इंक़लाब और ही कुछ | शाही शायरी
jahan-e-dil mein hue inqalab aur hi kuchh

ग़ज़ल

जहान-ए-दिल में हुए इंक़लाब और ही कुछ

शानुल हक़ हक़्क़ी

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जहान-ए-दिल में हुए इंक़लाब और ही कुछ
मिरी निगाह ने देखे थे ख़्वाब और ही कुछ

मिले हैं तालिब-ए-ईफ़ा को कुछ नए वा'दे
सवाल और ही कुछ था जवाब और ही कुछ

डरा न नार-ए-जहन्नम से मुझ को ऐ वाइ'ज़
मिरे जनम में लिखे हैं अज़ाब और ही कुछ

सजा के लाए थे कुछ लोग नामा-ए-आमाल
मियान-ए-हश्र हुआ एहतिसाब और ही कुछ

मिरी निगाह को इक उम्र में मिला ये भेद
कि हुस्न और ही कुछ है शबाब और ही कुछ

हुआ है सैल-ए-सुबुक-पा फ़िशार-ए-बाद से गुम
ये आया मरहला-ए-इन्क़िलाब और ही कुछ

नहीं हैं सत्ह पे ज़ाहिर अभी निशाँ जिस के
बुतून-ए-गेती में है पेच-ओ-ताब और ही कुछ