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जब वो मह-ए-रुख़्सार यकायक नज़र आया | शाही शायरी
jab wo mah-e-ruKHsar yakayak nazar aaya

ग़ज़ल

जब वो मह-ए-रुख़्सार यकायक नज़र आया

दाऊद औरंगाबादी

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जब वो मह-ए-रुख़्सार यकायक नज़र आया
उस माह की तलअत सूँ सुरज दिल में दर आया

तेरे रुख़-ए-रौशन कूँ सियह ख़त में सिरीजन
देखा सो कहा अब्र-ए-सियह में क़मर आया

गुलशन में चल ऐ सर्व-ए-सही सैर की ख़ातिर
तुझ वास्ते ले गुल तबक़-ए-नक़्द-ए-ज़र आया

तुझ जाम-ए-नयन में है अजब बादा-ए-सरशार
यक दीद सती जिस के हो दिल बे-ख़बर आया

मुहताज-ए-कबूतर नहीं मुझ शौक़ का नामा
क़ासिद हो मिरा दिल ले सजन की ख़बर आया

कहते हैं सब अहल-ए-सुख़न इस शेर कूँ सुन कर
तुझ तब्अ में 'दाऊद' 'वली' का असर आया