जब सें तुझ इश्क़ की गरमी का असर है मन में
तब सें फिरता हूँ उदासी हो बिरह के बन में
आज की रात मिरा चाँद नज़र आया है
चाँदनी दूद सी छिटकी है मिरे आँगन में
उस की साबित-क़दमी पर सती क़ुर्बान हूँ में
खेत छोड़ा नहीं मुझ दिल ने परत के रन में
क़तरा-ए-अश्क मिरा दाना-ए-तस्बीह हुआ
रात दिन मुझ कूँ गुज़रता है तिरी सुमरन में
जब सें दस्तार रंगाया है सनम अब्बासी
गुल-ए-अब्बास कूँ नीं रंग रहा गुलशन में
सैर-ए-दरिया सें नहीं हम कूँ तसल्ली मुमकिन
ग़म के तूफ़ान उबलते हैं हमारे मन में
क्यूँ न होए दिल-ए-याक़ूत-लबाँ मोम 'सिराज'
काम करता है मिरी आह का हीरा खन में
ग़ज़ल
जब सें तुझ इश्क़ की गरमी का असर है मन में
सिराज औरंगाबादी

