EN اردو
जब से साने ने बनाया है जहाँ का बहरूप | शाही शायरी
jab se sane ne banaya hai jahan ka bahrup

ग़ज़ल

जब से साने ने बनाया है जहाँ का बहरूप

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

;

जब से साने ने बनाया है जहाँ का बहरूप
अपनी नज़रों में है सब कौन-ओ-मकाँ का बहरूप

मैं गया भेस बदल कर तो लगा यूँ कहने
चल बे लाया है मिरे आगे कहाँ का बहरूप

चाँद तारे हैं ये कैसे ये शब ओ रोज़ है क्या
कुछ समझ में नहीं आता है यहाँ का बहरूप

चश्म-ए-बीना हों तो दाढ़ी की दो-रंगी समझें
एक चेहरे पे है ये पीर ओ जवाँ का बहरूप

पहने जाते हैं कई रंग के कपड़े दिन में
क्या कहूँ हाए ग़ज़ब है ये बुताँ का बहरूप

बाग़ में तुर्रा-ए-सुम्बुल की परेशानी से
साफ़ निकला तिरे शोरीदा-सराँ का बहरूप

'मुसहफ़ी' साँग से क्या उखड़े है पश्म उस की भला
सौ तरह से हो जिसे याद ज़बाँ का बहरूप