जब से साने ने बनाया है जहाँ का बहरूप
अपनी नज़रों में है सब कौन-ओ-मकाँ का बहरूप
मैं गया भेस बदल कर तो लगा यूँ कहने
चल बे लाया है मिरे आगे कहाँ का बहरूप
चाँद तारे हैं ये कैसे ये शब ओ रोज़ है क्या
कुछ समझ में नहीं आता है यहाँ का बहरूप
चश्म-ए-बीना हों तो दाढ़ी की दो-रंगी समझें
एक चेहरे पे है ये पीर ओ जवाँ का बहरूप
पहने जाते हैं कई रंग के कपड़े दिन में
क्या कहूँ हाए ग़ज़ब है ये बुताँ का बहरूप
बाग़ में तुर्रा-ए-सुम्बुल की परेशानी से
साफ़ निकला तिरे शोरीदा-सराँ का बहरूप
'मुसहफ़ी' साँग से क्या उखड़े है पश्म उस की भला
सौ तरह से हो जिसे याद ज़बाँ का बहरूप
ग़ज़ल
जब से साने ने बनाया है जहाँ का बहरूप
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

