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जब से गया है वो मिरा ईमान-ए-ज़िंदगी | शाही शायरी
jab se gaya hai wo mera iman-e-zindagi

ग़ज़ल

जब से गया है वो मिरा ईमान-ए-ज़िंदगी

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

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जब से गया है वो मिरा ईमान-ए-ज़िंदगी
काफ़िर हो जिस के दिल में हो अरमान-ए-ज़िंदगी

हसरत विसाल की है गुलू-गीर हिज्र में
वर्ना अभी मैं फाड़ूँ गरेबान-ए-ज़िंदगी

मरता जो हिज्र में तो न मिलता मैं यार से
मुझ पर 'हुज़ूर' बस कि है एहसान-ए-ज़िंदगी