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जब से असीर-ए-ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर हो गया | शाही शायरी
jab se asir-e-zulf-e-girah-gir ho gaya

ग़ज़ल

जब से असीर-ए-ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर हो गया

क़तील शिफ़ाई

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जब से असीर-ए-ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर हो गया
में बे-नियाज़-ए-हल्क़ा-ए-ज़ंजीर हो गया

जाता कहाँ भला तिरी महफ़िल को छोड़ कर
मैं अपने आप पाँव की ज़ंजीर हो गया

नूर-ए-जहाँ कोई न कोई यूँ तो सब की थी
दौलत से एक शख़्स जहाँगीर हो गया

मुझ में रची हुई तिरी ख़ुशबू थी इस लिए
बढ़ कर अदू भी मुझ से बग़ल-गीर हो गया

फिर बाँध ली किसी से उम्मीद-ए-वफ़ा 'क़तील'
फिर इक महल हवाओं में ता'मीर हो गया