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जब परी-रू हिजाब करते हैं | शाही शायरी
jab pari-ru hijab karte hain

ग़ज़ल

जब परी-रू हिजाब करते हैं

दाऊद औरंगाबादी

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जब परी-रू हिजाब करते हैं
दिल के दर्पन कूँ आब करते हैं

गर्दिश-ए-चश्म का दिखा यक दौर
हम कूँ मस्त-ए-शराब करते हैं

आतिश-ए-इश्क़ की अगन सूँ जला
आशिक़ाँ कूँ कबाब करते हैं

ताब दिखला जमाल-ए-रौशन का
आरसी ग़र्क़-ए-आब करते हैं

बैत-ए-अबरू पे तिल सूँ काजल के
नुक़्ता-ए-इंतिख़ाब करते हैं

अरक़-ए-गुल-रुख़ाँ को देख उश्शाक़
मैल इत्र-ए-गुलाब करते हैं

देख उस के हिना कूँ मर्दुम-ए-चश्म
ख़ून-ए-दिल सूँ ख़िज़ाब करते हैं

सुन सुख़न-दाँ तिरी ग़ज़ल 'दाऊद'
आफ़रीं कर ख़िताब करते हैं