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जब कभी हम तिरे कूचे से गुज़र जाते हैं | शाही शायरी
jab kabhi hum tere kuche se guzar jate hain

ग़ज़ल

जब कभी हम तिरे कूचे से गुज़र जाते हैं

शकील बदायुनी

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जब कभी हम तिरे कूचे से गुज़र जाते हैं
लौह-ए-इदराक पे कुछ और उभर जाते हैं

हुस्न से लीजिए तंज़ीम-ए-दो-आलम का सबक़
सुब्ह होती है तो गेसू भी सँवर जाते हैं

हम ने पाया है मोहब्बत का ख़ुमार-ए-अबदी
कैसे होते हैं वो नश्शे कि उतर जाते हैं

इतने ख़ाइफ़ हैं मय-ओ-मह से जनाब-ए-वाइज़
नाम-ए-क़ौसर भी जो सुनते हैं तो डर जाते हैं

मय-कदा बंद मुक़फ़्फ़ल हैं दर-ए-दैर-ओ-हरम
देखना है कि 'शकील' आज किधर जाते हैं