जाएज़ है उस का क़त्ल हमारे हिसाब से
जिस ने मोहब्बतों को निकाला निसाब से
तन्क़ीद कर रहे हैं किताब-ए-हयात पर
आगे न बढ़ सके जो कभी इंतिसाब से
मैं साहब-ए-ख़बर भी नज़र भी जुनूँ भी था
जब तक रहा था मेरा तअ'ल्लुक़ किताब से
उस वक़्त एक सज्दा बड़े काम आ गया
मैं जब गुज़र रहा था अना के अज़ाब से
इक लम्हे का फ़िराक़ हवाएँ न सह सकीं
दरिया कि शर्मसार रहेगा हबाब से
मुझ से बड़े बड़े थे गुनहगार उस जगह
बे-कार डर रहा था मैं यौम-ए-हिसाब से
काँटों के ख़ौफ़ से भी लरज़ते हो तुम 'मुनीर'
और घर भी चाहते हो सजाना गुलाब से
ग़ज़ल
जाएज़ है उस का क़त्ल हमारे हिसाब से
मुनीर सैफ़ी

