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जादा-ए-इश्क़ में गिर गिर के सँभलते रहना | शाही शायरी
jada-e-ishq mein gir gir ke sambhalte rahna

ग़ज़ल

जादा-ए-इश्क़ में गिर गिर के सँभलते रहना

शकील बदायुनी

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जादा-ए-इश्क़ में गिर गिर के सँभलते रहना
पाँव जल जाएँ मगर आग पे चलते रहना

जल्वा-ए-अम्न तुम्हीं से है मोहब्बत वालो
महर-ए-ताबाँ की तरह रोज़ निकलते रहना

नग़्मा-ए-इश्क़ न हो एक ही धुन पर क़ाइम
वक़्त के साथ ज़रा राग बदलते रहना

ज़िंदगी को मह-ओ-अंजुम न उजाला देंगे
तुम न इन झूटे खिलौनों से बहलते रहना

है यही वक़्त-ए-अमल जोहद-ए-मुसलसल की क़सम
बे-सहारों की तरह हाथ न मलते रहना

ज़िंदगानी है फ़क़त गर्मी-ए-रफ़्तार का नाम
मंज़िलें साथ लिए राह पे चलते रहना

है सितारों की तरह माइल-ए-परवाज़ 'शकील'
दुश्मनो तुम को क़सम है यूँही जलते रहना