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इश्क़ में अव्वल फ़ना दरकार है | शाही शायरी
ishq mein awwal fana darkar hai

ग़ज़ल

इश्क़ में अव्वल फ़ना दरकार है

सिराज औरंगाबादी

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इश्क़ में अव्वल फ़ना दरकार है
दिल सीं तर्क-ए-मा-सिवा दरकार है

तर्क-ए-मक़्सद ऐन मक़्सद है उसे
जिस कूँ दिल का मुद्दआ दरकार है

दिल ब-तंग आया है अब लाज़िम है आह
ग़ुंचा-ए-गुल कूँ सबा दरकार है

ज़ख़्मी-ए-ग़म क्यूँ न खींचे आह-ए-दर्द
हल्क़-ए-बिस्मिल कूँ सदा दरकार है

वस्फ़ ज़ुल्फ़-ए-यार का आसाँ नहीं
रिश्ता-ए-फ़िक्र-ए-रसा दरकार है

है लब-ए-साक़ी में चश्मा ख़िज़्र का
गर तुझे आब-ए-बक़ा दरकार है

रंग मेरा कान-ए-ज़र है ऐ सनम
मुझ सीं आ मिल गिर तला दरकार है

गोशा-ए-अबरू दिखा ऐ क़िबला-रू
मुझ कूँ मेहराब-ए-दुआ दरकार है

दिल रक़ीबों का जलाने ऐ 'सिराज'
आतिशीं-रू दिलरुबा दरकार है