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इश्क़ को बार-ए-ज़िंदगी न कहो | शाही शायरी
ishq ko bar-e-zindagi na kaho

ग़ज़ल

इश्क़ को बार-ए-ज़िंदगी न कहो

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

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इश्क़ को बार-ए-ज़िंदगी न कहो
बात इतनी भी बे-तुकी न कहो

दिल को जिस में हो फ़िक्र-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ
उस तिजारत को आशिक़ी न कहो

कुछ तो मरने का हौसला दिखलाओ
सिर्फ़ जीने को ज़िंदगी न कहो

दिल-लगी के सिवा भी कुछ है इश्क़
इश्क़ को महज़ दिल-लगी न कहो

कुछ न कह कर भी अपने दिल की बात
यूँ ब-अंदाज़-ए-ख़ामुशी न कहो

सब कहो पर हमें ख़ुदा के लिए
अपने महफ़िल में अजनबी न कहो

जिस को कुछ आदमी का दर्द न हो
ऐसे ज़ालिम को आदमी न कहो

दिल को बख़्शे जो ज़िंदगी 'मंशा'
तुम तो उस ग़म को ग़म कभी न कहो