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इश्क़ की चिंगारियों को फिर हवा देने लगे | शाही शायरी
ishq ki chingariyon ko phir hawa dene lage

ग़ज़ल

इश्क़ की चिंगारियों को फिर हवा देने लगे

शकील बदायुनी

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इश्क़ की चिंगारियों को फिर हवा देने लगे
मेरे पास आ कर वो दुश्मन को दुआ देने लगे

मय-कदे का मय-कदा ख़ामोश था मेरे बग़ैर
मैं हुआ वारिद तो पैमाने सदा देने लगे

ख़त्म करना ही पड़ेंगी शाम-ए-ग़म की उलझनें
अब वो अपने गेसुओं का वास्ता देने लगे

ए'तिराफ़-ए-औज का जज़्बा नहीं अहबाब में
हर तरक़्क़ी पर तरक़्क़ी की दुआ देने लगे

दोस्तों की कज-अदाई मैं भी लज़्ज़त है 'शकील'
दोस्त वो है दोस्त बन कर जो दग़ा देने लगे