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इश्क़ के अक़्लीम में चाल-ओ-चलन कुछ और है | शाही शायरी
ishq ke aqlim mein chaal-o-chalan kuchh aur hai

ग़ज़ल

इश्क़ के अक़्लीम में चाल-ओ-चलन कुछ और है

शाह आसिम

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इश्क़ के अक़्लीम में चाल-ओ-चलन कुछ और है
है निराला ढंग वाँ का और अजाइब तौर है

ख़ून-ए-दिल पीती हैं वाँ और खाती हैं लख़्त-ए-जिगर
लुत्फ़ के बदले उठाने को जफ़ा-ओ-जौर है

उन की गलियों में नहीं होता गुज़र ही अक़्ल का
है जुनूँ का बंद-ओ-बस्त और आशिक़ी का दौर है

ज़िंदगी और मर्ग शादी और ग़म और नेक-ओ-बद
एक साँ हैं सब वहाँ लेकिन मक़ाम-ए-ग़ौर है

ला-मकाँ है वास्ते उन की मक़ाम-ए-बूद-ओ-बाश
गो ब-ज़ाहिर कहने को कलकत्ता और लाहौर है

आह-ओ-नाला की चला करती हैं वाँ तीर-ओ-सिनान
जो कि जाता है वहाँ रहता वहीं वो ठोर है

इब्तिदा में जीते जी मर जाना पड़ता है वहाँ
पर जो मर जाता है वाँ जीता वहीं फ़िल-फ़ौर है

हूँ मैं जान-ओ-दिल से 'आसिम' शाह-ए-ख़ादिम पर फ़िदा
इश्क़ के किश्वर में जिस की शान-ओ-शौकत और है