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इस तरह आता हूँ बाज़ारों के बीच | शाही शायरी
is tarah aata hun bazaron ke beach

ग़ज़ल

इस तरह आता हूँ बाज़ारों के बीच

फ़रहत एहसास

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इस तरह आता हूँ बाज़ारों के बीच
जैसे नींद आ जाए बेदारों के बीच

मैं मुसलसल मुल्तवी होता हुआ
हर घड़ी हर गाम तय्यारों के बीच

लड़खड़ाने लगती हैं साँसें मिरी
हर-नफ़स हर हाल हमवारों के बीच

याद सहरा की हुजूम-ए-शहर में
ज़िंदगी का ख़्वाब बीमारों के बीच

ख़ुद-ब-ख़ुद बंद-ए-क़बा खुलते हुए
हैरत-ए-इक़रार इन्कारों के बीच

हम ख़ुद अफ़्साने के बाहर हो गए
मर ही जाते ऐसे किरदारों के बीच

हम अलम-बरदार अपने जेहल के
मकतबों के इल्म-बरदारों के बीच

'फ़रहत-एहसास' आ गया क्या बज़्म में
सादगी आई है होशयारों के बीच