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इस क़दर ग़म है कि इज़हार नहीं कर सकते | शाही शायरी
is qadar gham hai ki izhaar nahin kar sakte

ग़ज़ल

इस क़दर ग़म है कि इज़हार नहीं कर सकते

अय्यूब ख़ावर

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इस क़दर ग़म है कि इज़हार नहीं कर सकते
ये वो दरिया है जिसे पार नहीं कर सकते

आप चाहें तो करें दर्द को दिल से मशरूत
हम तो इस तरह का व्यापार नहीं कर सकते

जान जाती है तो जाए मगर ऐ दुश्मन-ए-जाँ
हम कभी तुझ पे कोई वार नहीं कर सकते

जितनी रुस्वाई मिली आप की निस्बत से मिली
आप इस बात से इंकार नहीं कर सकते

आप कर सकते हैं ख़ुशबू को सबा से महरूम
और कुछ साहब-ए-किरदार नहीं कर सकते

एक ज़ंजीर सी पलकों से बंधी रहती है
फिर भी इक दश्त को गुलज़ार नहीं कर सकते

ये गुल-ए-दर्द है इस को तो महकना है हुज़ूर
आप ख़ुशबू को गिरफ़्तार नहीं कर सकते