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इस लब कूँ कब पसंद हैं रस्मी कटोरियाँ | शाही शायरी
is lab kun kab pasand hain rasmi kaToriyan

ग़ज़ल

इस लब कूँ कब पसंद हैं रस्मी कटोरियाँ

सिराज औरंगाबादी

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इस लब कूँ कब पसंद हैं रस्मी कटोरियाँ
लाला के फूल की हैं जिसे क़हवा ख़ोरियाँ

दाम-ओ-क़फ़स न चाहिए दिल के शिकार कूँ
करती हैं बंद आँख के डोरों की डोरियाँ

है बस कि दौर-ए-साग़र-ए-चश्म-ए-परी-रुख़ाँ
गिर गई हैं दिल के ताक़ सें नर्गिस की ग़ोरियां

हँसते हो क्यूँ जो तुम ने मिरा दिल नहीं लिए
मालूम हुईं तुम्हारी निगाहों की चोरियाँ

अब ग़म की रात सैर-ए-चराग़ाँ है ऐ 'सिराज'
ये अश्क गर्म तेल है आँखें सकोरियाँ