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इन आँखों से आब कुछ न निकला | शाही शायरी
in aankhon se aab kuchh na nikla

ग़ज़ल

इन आँखों से आब कुछ न निकला

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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इन आँखों से आब कुछ न निकला
ग़ैर-अज़ ख़ूँ-नाब कुछ न निकला

बोसे का क्या सवाल लेकिन
उस मुँह से जवाब कुछ न निकला

बाहम हुई यूँ तो दीद-वा-दीद
पर दिल का हिजाब कुछ न निकला

जुज़ तेरी हवा के अपने सर में
मानिंद-ए-हबाब कुछ न निकला

करता था बहुत सा मुझ पे दा'वा
पर वक़्त-ए-हिसाब कुछ न निकला

सीने में जो दिल की की तफ़ह्हुस
जुज़ दूद-ए-कबाब कुछ न निकला

हम समझते थे जिस को 'मुसहफ़ी' यार
वो ख़ाना-ख़राब कुछ न निकला