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इक हर्फ़-ए-कुन में जिस ने कौन-ओ-मकाँ बनाया | शाही शायरी
ek harf-e-kun mein jis ne kaun-o-makan banaya

ग़ज़ल

इक हर्फ़-ए-कुन में जिस ने कौन-ओ-मकाँ बनाया

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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इक हर्फ़-ए-कुन में जिस ने कौन-ओ-मकाँ बनाया
सारे जहाँ का तुझ को आराम-ए-जाँ बनाया

बू-ए-मोहब्बत अपनी रक्खी ख़ुदा ने इस में
सीने में आदमी के दिल इत्र-दाँ बनाया

अपनी तो इस चमन में नित उम्र यूँही गुज़री
याँ आशियाँ बनाया वाँ आशियाँ बनाया

मेहनत पे टुक नज़र कर सूरतगर-ए-अज़ल ने
चालीस दिन में तेरा मीम-ए-दहाँ बनाया

अज़-बस-कि इस सफ़र में मंज़िल को हम न पहुँचे
आवारगी ने हम को रेग-ए-रवाँ बनाया

मग़रूर क्यूँ न होवे सनअत पर अपनी साने
किस वास्ते जब उस ने ये गुलिस्ताँ बनाया

ख़ून-ए-जिगर से मेरे गुल की शबीह खींची
नाले को मेरे ले कर सर्व-ए-रवाँ बनाया

आता है 'मुसहफ़ी' तू ये किस के ज़ख़्म खाए
तीर-ए-जफ़ा का किस ने तुझ को निशाँ बनाया

सौ टुकड़े है गरेबाँ दामन लहू में तर है
ये रंग तू ने ज़ालिम अपना कहाँ बनाया