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ईमाँ का लुत्फ़ पहलू-ए-तश्कीक में मिला | शाही शायरी
iman ka lutf pahlu-e-tashkik mein mila

ग़ज़ल

ईमाँ का लुत्फ़ पहलू-ए-तश्कीक में मिला

फ़रहत एहसास

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ईमाँ का लुत्फ़ पहलू-ए-तश्कीक में मिला
ये चाँद जब मिला शब-ए-तारीक में मिला

बरसों रहा हूँ कासा-ए-तन्हाई हो के मैं
इक दिन हुज़ूर-ए-यार मुझे भीक में मिला

हल्का सा इक लबों का इशारा ही था बहुत
फिर जो मिला मुझे उसी तहरीक में मिला

ज़ीना मिरी बुलंदी-ए-दरजात का बना
तुझ को जो ये मज़ा मिरी तज़हीक में मिला

खाया था किस के हाथ से 'एहसास-जी' ने पान
ख़ून-ए-बदन सब उस की बस इक पीक में मिला