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हो रहा है अब्र और करता है वो जानाना रक़्स | शाही शायरी
ho raha hai abr aur karta hai wo jaanana raqs

ग़ज़ल

हो रहा है अब्र और करता है वो जानाना रक़्स

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

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हो रहा है अब्र और करता है वो जानाना रक़्स
बर्क़ गिर्द उस के करे है आ के बे-ताबाना रक़्स

दौर में चश्म-ए-गुलाबी के तिरे ऐ बादा-नोश
बज़्म में करता है मस्तों की तरह पैमाना रक़्स

इस क़द ओ रुख़्सार पर ऐ शम्अ-रू इस हुस्न पर
क़मरी ओ बुलबुल करे है वज्द और परवाना रक़्स

घुँगरू जाने है पाँव में वो ज़ंजीरों के तईं
क्यूँ न इस आवाज़ पर बन बन करे दीवाना रक़्स

जिस के घर आवे वो 'हातिम' नाज़ से रखता क़दम
उठ खड़ा हो कर करे इस आन साहिब-ख़ाना रक़्स