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हिज्र की आग में अज़ाब में न दे | शाही शायरी
hijr ki aag mein azab mein na de

ग़ज़ल

हिज्र की आग में अज़ाब में न दे

सिराज औरंगाबादी

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हिज्र की आग में अज़ाब में न दे
मिस्ल-ए-सीमाब इज़्तिराब न दे

संदली हुस्न है तिरा दरकार
दर्द-ए-सर कूँ मिरे गुलाब न दे

बस तिरा दौर-ए-चश्म ऐ साक़ी
होश खोने मुझे शराब न दे

ज़ाहिद-ए-ख़ुश्क कूँ शराब न दे
आग दे ख़ार-ओ-ख़स को आब न दे

अपने मारों को मत परेशाँ कर
ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं कूँ पेच-ओ-ताब न दे

आशिक़ों कूँ है लज़्ज़त-ए-दुश्नाम
हर कमीने कूँ ये ख़िताब न दे

किस ने ऐ बहर-ए-हुस्न तुझ कूँ कहा
कि किसी तिश्ना-लब कूँ आब न दे

काम जाहिल का है सुख़न-चीनी
ऐ 'सिराज' उस कूँ तू जवाब न दे