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हवास में तो न थे फिर भी क्या न कर आए | शाही शायरी
hawas mein to na the phir bhi kya na kar aae

ग़ज़ल

हवास में तो न थे फिर भी क्या न कर आए

जौन एलिया

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हवास में तो न थे फिर भी क्या न कर आए
कि दार पर गए हम और फिर उतर आए

अजीब हाल के मजनूँ थे जो ब-इश्वा-ओ-नाज़
ब-सू-ए-बाद ये महमिल में बैठ कर आए

कभी गए थे मियाँ जो ख़बर के सहरा की
वो आए भी तो बगूलों के साथ घर आए

कोई जुनूँ नहीं सौदाइयान-ए-सहरा को
कि जो अज़ाब भी आए वो शहर पर आए

बताओ दाम गुरु चाहिए तुम्हें अब क्या
परिंदगान-ए-हवा ख़ाक पर उतर आए

अजब ख़ुलूस से रुख़्सत किया गया हम को
ख़याल-ए-ख़ाम का तावान था सो भर आए