हर नफ़स इक नई ज़ंजीर मुझे मिलती है
जीना पड़ता है मुझे हीर मुझे मिलती है
भागता रहता हूँ परछाइयों की यूरिश से
हर जगह अपनी ही तस्वीर मुझे मिलती है
बे-नवाई में मिरे दिल को सुकूँ है कितना
चैन से जीने की जागीर मुझे मिलती है
मैं ने देखा था कभी सायों के टकराव का ख़्वाब
आज उस ख़्वाब की ताबीर मुझे मिलती है
कोई लौटाता है भेजा हुआ तोहफ़ा मुझ को
प्यार के बदले में तहक़ीर मुझे मिलती है

ग़ज़ल
हर नफ़स इक नई ज़ंजीर मुझे मिलती है
जमाल ओवैसी