EN اردو
हमारे पास जानाँ आन पहुँचा | शाही शायरी
hamare pas jaanan aan pahuncha

ग़ज़ल

हमारे पास जानाँ आन पहुँचा

सिराज औरंगाबादी

;

हमारे पास जानाँ आन पहुँचा
दिल-ए-बे-जान कूँ अब जान पहुँचा

न होवे क्यूँ शोर दिल की बांसली में
मलाहत का सलोना कान पहुँचा

कमाँ-अबरू की हर तिरछी निगह सीं
जिगर के तोड़ने कूँ बान पहुँचा

दिखाया मुसहफ़-ए-रुख़्सार अपनाँ
हमारा दीन और ईमान पहुँचा

मुझे कह काकरेज़ी चीरे वाले
कि वक़्त-ए-सैर-ए-ना-फ़रमान पहुँचा

मय ओ जाम ओ गुल-ए-मुतरिब है मौजूद
बहार-ए-वस्ल का सामान पहुँचा

दिल-ए-मुफ़्लिस ने पाया वस्ल का गंज
भिकारी कूँ दरस का दान पहुँचा

'सिराज' अब घर तिरा रौशन हुआ है
मगर वो शम्अ-रू मेहमान पहुँचा