हम रहे पर नहीं रहे आबाद
याद के घर नहीं रहे आबाद
कितनी आँखें हुईं हलाक-ए-नज़र
कितने मंज़र नहीं रहे आबाद
हम कि ऐ दिल-सुख़न थे सर-ता-पा
हम लबों पर नहीं रहे आबाद
शहर-ए-दिल में अजब मोहल्ले थे
उन में अक्सर नहीं रहे आबाद
जाने क्या वाक़िआ' हुआ क्यूँ लोग
अपने अंदर नहीं रहे आबाद
ग़ज़ल
हम रहे पर नहीं रहे आबाद
जौन एलिया

