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हम पी गए सब हिले न लब तक | शाही शायरी
hum pi gae sab hile na lab tak

ग़ज़ल

हम पी गए सब हिले न लब तक

शोहरत बुख़ारी

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हम पी गए सब हिले न लब तक
जी हार गए नुजूम-ए-शब तक

हर चंद घटाएँ छट गई हैं
पर दल पे ग़ुबार सा है अब तक

ख़ुश हो न ज़माना मेरे ग़म पर
आएगा ये दौर-ए-जाम सब तक

अश्कों ने फ़साना कर दिया है
वो लफ़्ज़ कि आ सका न लब तक

हर ग़म को उड़ा दया हँसी में
तुम पेश-ए-नज़र रहे हो जब तक

मय-ख़ाने मैं सर छुपाएँ आओ
वा हो दर-ए-का'बा जाने कब तक

'शोहरत' कोई और बात छेड़ो
उलटें वो नक़ाब-ए-लुत्फ़ जब तक