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हम हैं मुश्ताक़-ए-जवाब और तुम हो उल्फ़त सीं बईद | शाही शायरी
hum hain mushtaq-e-jawab aur tum ho ulfat sin baid

ग़ज़ल

हम हैं मुश्ताक़-ए-जवाब और तुम हो उल्फ़त सीं बईद

सिराज औरंगाबादी

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हम हैं मुश्ताक़-ए-जवाब और तुम हो उल्फ़त सीं बईद
नक़्द-ए-दिल गर तुम कूँ पहुँचा है तो भिजवा देव रसीद

बाग़ में हम मर गए महरूम-ए-वस्ल-ए-गुल-बदन
हैं हमारे आज फूल और बुलबुलों के हक़ में ईद

लश्कर-ए-क़ल्ब-ए-सफ़-ए-उश्शाक़ में है ग़लग़ला
यक्का-ताज़-ए-आह कूँ किस ने किया है ना-रसीद

हुस्न कूँ है नक़्द-ए-नाज़ और इश्क़ कूँ जिंस-ए-नियाज़
फिर अबस शिकवा है ये सौदा हुआ है ख़ुश-ख़रीद

बाग़ सीं गुलचीं चला तब बुलबुलों ने ग़ुल किया
हज़रत-ए-गुल कूँ किया जाता है ये काफ़िर शहीद

रह-नवर्दान-ए-जुनूँ कूँ फ़तहयाब-ए-फ़ैज़ है
आबलों के क़ुफ़्ल को ख़ार-ए-बयाबाँ है कलीद

बुत-परस्तों कूँ है ईमान-ए-हक़ीक़ी वस्ल-ए-बुत
बर्ग-ए-गुल है बुलबुलों कूँ जिल्द-ए-क़ुरआन-मजीद

नूर-ए-जाँ फ़ानूस-ए-जिस्मी सीं जुदा कब है 'सिराज'
शोला तार-ए-शम्अ सीं कहता है मिन-हब्लिल-वरीद