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हाए शर्म-ए-दिलबरी उस दिलरुबा के हाथ है | शाही शायरी
hae sharm-e-dilbari us dilruba ke hath hai

ग़ज़ल

हाए शर्म-ए-दिलबरी उस दिलरुबा के हाथ है

रशीद लखनवी

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हाए शर्म-ए-दिलबरी उस दिलरुबा के हाथ है
इस वफ़ा की आबरू उस बेवफ़ा के हाथ है

जानता है काम बंदे का ख़ुदा के हाथ है
दिल मिरा खुलना तिरे बंद-ए-क़बा के हाथ है

आह-ए-गिर्या साथ हों ग़ुर्बत में जब आता है ध्यान
बेकसी कहती है ये आब-ओ-हवा के हाथ है

कब तक आओगे अदम में पूछते हैं राह-रौ
किस से कहिए उस तरफ़ आना क़ज़ा के हाथ है

हाथ उठाता हूँ ख़ुदा के सामने मैं ऐ 'रशीद'
ढूँढना बाब-ए-इजाबत को दुआ के हाथ है