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ग़ुस्से को जाने दीजे न तेवरी चढ़ाइए | शाही शायरी
ghusse ko jaane dije na tewari chaDhaiye

ग़ज़ल

ग़ुस्से को जाने दीजे न तेवरी चढ़ाइए

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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ग़ुस्से को जाने दीजे न तेवरी चढ़ाइए
मैं गालियाँ भी आप की खाईं अब आइए

रफ़्तार का जो फ़ित्ना उठा था सो हो चुका
अब बैठे बैठे और कोई फ़ित्ना उठाइए

मेरा तो क्या दहन है जो बोसे का लूँ मैं नाम
गाली भी मुझ को दीजे तो गोया जलाइए

बोला किसी से मैं भी तो क्या कुछ ग़ज़ब हुआ
इतनी सी बात का न बतंगड़ बनाइए

ऐसा न हो कि जाए शिताबी से दम निकल
चाक-ए-जिगर से पहले मिरा मुँह सिलाइए

रक्खा जो इक शहीद की तुर्बत पे उस ने पाँव
आई सदा ये वाँ से कि दामन उठाइए

बिकते हैं तेरे नाम से हम ऐ कमंद-ए-ज़ुल्फ़
तुझ को भी छोड़ दीजिए तो किस के कहाइए

उस की गली न मकतब-ए-तिफ़्लाँ है 'मुसहफ़ी'
ता चंद जाइए सहर और शाम आइए