EN اردو
गुल-रुख़ों ने किए हैं सैर का ठाट | शाही शायरी
gul-ruKHon ne kiye hain sair ka ThaT

ग़ज़ल

गुल-रुख़ों ने किए हैं सैर का ठाट

सिराज औरंगाबादी

;

गुल-रुख़ों ने किए हैं सैर का ठाट
गुलशन-आबाद का भरा है हाट

तेग़-ए-अबरू सें मैं शहीद हुआ
इस सुरूही का क्या बला है काट

दिल में आ राह-ए-चश्म-ए-हैराँ सें
खुल रहे हैं मिरी पलक के पाट

ज़हर हैं उस कूँ नेमत-ए-अलवान
लज़्ज़त-ए-इश्क़ की जिसे है चाट

नहीं असर तीर-ए-आह कूँ इस में
दिल-ए-संगीं तिरा है लोहा लाट

पंजा-ए-इश्क़ के शिकंजा सें
मैं हुआ शश-जिहत में बारा बाट

ऐ 'सिराज' अश्क के चराग़ों कूँ
नए मिज़्गाँ सें हम ने बाँधे ठाट