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गरचे ऐ दिल आशिक़-ए-शैदा है तू | शाही शायरी
garche ai dil aashiq-e-shaida hai tu

ग़ज़ल

गरचे ऐ दिल आशिक़-ए-शैदा है तू

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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गरचे ऐ दिल आशिक़-ए-शैदा है तू
लेकिन अपने काम में यकता है तू

आशिक़ ओ माशूक़ करता है जुदा
ऐ फ़लक ये काम भी करता है तू

लाख पर्दे गर हों तेरे हुस्न पर
कोई पर्दों में छुपा रहता है तू

हाल-ए-दिल कहने लगूँ हूँ मैं तो शोख़
मुझ से यूँ कहता है ''क्या बकता है तू''

पास बैठा उस के मैं रोया किया
यूँ न पूछा मुझ से ''क्यूँ रोता है तू''

रात दिन तू है मिरी आग़ोश में
मैं तिरा साहिल मिरा दरिया है तू

बज़्म में उस तुंद-ख़ू की दौड़ दौड़
काम क्या? क्यूँ? किस लिए जाता है तू

वाँ नहीं मुतलक़ तिरा मज़कूर भी
'मुसहफ़ी' किस बात पर भूला है तू