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गर अपने आप में इंसान बढ़ता जा रहा है | शाही शायरी
gar apne aap mein insan baDhta ja raha hai

ग़ज़ल

गर अपने आप में इंसान बढ़ता जा रहा है

फ़रहत एहसास

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गर अपने आप में इंसान बढ़ता जा रहा है
तो फिर क्यूँ इस क़दर बोहरान बढ़ता जा रहा है

सिमटता जा रहा है दायरा मालिक मकाँ का
मकाँ पर क़ब्ज़ा-ए-मेहमान बढ़ता जा रहा है

मुझे लगता है सहरा की तरफ़ जाना पड़ेगा
दर-ओ-दीवार का एहसान बढ़ता जा रहा है

बहुत दिन हो गए रोया न अपने हाल पे शहर
दिलों में ख़ित्ता-ए-वीरान बढ़ता जा रहा है

बहुत सा हुस्न पहली बार देखा है किसी ने
तू उस की ही तरफ़ हैरान बढ़ता जा रहा है

बदन ख़ाली करो और कश्ती-ए-जाँ को बचाओ
ख़तरनाकी का ये सामान बढ़ता जा रहा है

नुमू करना सुना है जान-दारों की सिफ़त है
मगर ये शहर तो बे-जान बढ़ता जा रहा है

न जाने कितने भूखों की किफ़ालत हो रही है
हवस-कारी का दस्तर-ख़्वान बढ़ता जा रहा है

मियाँ 'एहसास-जी' कुछ शाइ'री भी करते रहिए
ये माना आप का दीवान बढ़ता जा रहा है