ग़ैरों से मिल चले तुम मस्त-ए-शराब हो कर
ग़ैरत से रह गए हम यकसू कबाब हो कर
उस रू-ए-आतिशीं से बुर्क़ा सरक गया था
गुल बह गया चमन में ख़जलत से आब हो कर
कल रात मुँद गई थीं बहुतों की आँखें ग़श से
देखा किया न कर तो सरमस्त ख़्वाब हो कर
पर्दा रहेगा क्यूँकर ख़ुर्शीद-ए-ख़ावरी का
निकले है वो भी अब बे-नक़ाब हो कर
यक क़तरा आब मैं ने इस दौर में पिया है
निकला है चश्म-ए-तर से वो ख़ून-ए-नाब हो कर
आ बैठता था सूफ़ी हर सुब्ह मय-कदे में
शुक्र-ए-ख़ुदा कि निकला वाँ से ख़राब हो कर
शर्म-ओ-हया कहाँ तक हैं 'मीर' कोई दिन के
अब तो मिला करो तुम टुक बे-हिजाब हो कर
ग़ज़ल
ग़ैरों से मिल चले तुम मस्त-ए-शराब हो कर
मीर तक़ी मीर

