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फ़रेब-ए-मोहब्बत से ग़ाफ़िल नहीं हूँ | शाही शायरी
fareb-e-mohabbat se ghafil nahin hun

ग़ज़ल

फ़रेब-ए-मोहब्बत से ग़ाफ़िल नहीं हूँ

शकील बदायुनी

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फ़रेब-ए-मोहब्बत से ग़ाफ़िल नहीं हूँ
जो मस्त-ए-जुनूँ हो वो दिल नहीं हूँ

उन्हें अज़्म-ए-तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ मुबारक
मैं उन के इरादों में हाइल नहीं हूँ

तिरी बज़्म से है बस इतना तअल्लुक़
कि शामिल भी हूँ और शामिल नहीं हूँ

क़ौम और अग़्यार के मश्वरों से
मैं ऐसी इनायत का क़ाइल नहीं हूँ

सँभल कर ज़रा ऐ मोहब्बत की कश्ती
मैं तूफ़ाँ ही तूफ़ाँ हूँ साहिल नहीं हूँ

मिरा सोज़-ए-हस्ती है दूर-अज़ नदामत
मैं परवाना हूँ शम-ए-महफ़िल नहीं हूँ