दिन ढला शाम हुई फूल कहीं लहराए
साँप यादों के महकते हुए डसने आए
वो कड़ी धूप के दिन वो तपिश-ए-राह-ए-वफ़ा
वो सवाद-ए-शब-ए-गेसू के घनेरे साए
दौलत-ए-तब्-ए-सुख़न-गो है अमानत उस की
जब तिरी चश्म-ए-सुख़न-साज़ तलब फ़रमाए
जुस्तुजू-ए-ग़म-ए-दौराँ को ख़िरद निकली थी
कि जुनूँ ने ग़म-ए-जानाँ के ख़ज़ीने पाए
सब मुझे मश्वरा-ए-तर्क-ए-वफ़ा देते हैं
उन का ईमा भी हो शामिल तो मज़ा आ जाए
क्या कहूँ दिल ने कहाँ सैंत के रक्खा है उसे
न कभी भूलने पाऊँ न मुझे याद आए
मैं ने हाफ़िज़ की तरह तय ये किया है 'आबिद'
बा'द-अज़ीं मय न ख़ुरम बे-कफ़-ए-बज़्म-आराए
ग़ज़ल
दिन ढला शाम हुई फूल कहीं लहराए
सय्यद आबिद अली आबिद