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दिन-ब-दिन अब लुत्फ़ तेरा हम पे कम होने लगा | शाही शायरी
din-ba-din ab lutf tera hum pe kam hone laga

ग़ज़ल

दिन-ब-दिन अब लुत्फ़ तेरा हम पे कम होने लगा

सिराज औरंगाबादी

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दिन-ब-दिन अब लुत्फ़ तेरा हम पे कम होने लगा
या तो था वैसा करम या ये सितम होने लगा

सच कहो तक़्सीर क्या है आशिक़-ए-मज़लूम की
नीमचा तिरछी निगह का क्यूँ अलम होने लगा

तेग़-ए-अबरू कूँ निपट कसते हो पन हैराँ हूँ मैं
कौन से बीमार पर ये आब दम होने लगा

शुक्र-ए-अल्लाह सर्व-ए-राना के तसव्वुर के तुफ़ैल
रफ़्ता रफ़्ता दिल मिरा बाग़-ए-इरम होने लगा

बस करो ऐ शाह-ए-फ़ौज-ए-हुस्न क़त्ल-ए-आम कूँ
आशिक़ों की आह का नेज़ा अलम होने लगा

तुझ कूँ ऐ आहू-निगाह किस ने सिखाया ये तरह
या तो था औरों सीं रम या हम सीं रम होने लगा

हिज्र की रातों में ये मिस्रा हुआ विर्द-ए-'सिराज'
दिन-ब-दिन अब लुत्फ़ तेरा हम पे कम होने लगा