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दिलों के आइने धुँदले पड़े हैं | शाही शायरी
dilon ke aaine dhundle paDe hain

ग़ज़ल

दिलों के आइने धुँदले पड़े हैं

फ़ुज़ैल जाफ़री

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दिलों के आइने धुँदले पड़े हैं
बहुत कम लोग ख़ुद को जानते हैं

ख़िज़ाँ के ख़ुश्क पत्तों को न छेड़ो
थके-माँदे मुसाफ़िर सो रहे हैं

हमारी ग़म-गुसारी में शब-ए-ग़म
चराग़ आहिस्ता आहिस्ता जले हैं

निशाँ पाता नहीं कोई किसी का
सभी इक दूसरे को ढूँडते हैं

बस इक मौज-ए-हवा-ए-ग़म है काफ़ी
इरादे क्या घरौंदे रेत के हैं

ख़ुदा दिल का नगर आबाद रखे
हज़ारों तरह के ग़म पल रहे हैं

शब-ए-महताब यादें गुल-रुख़ों की
सफ़ीने मौज-ए-ख़ूँ में तैरते हैं