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दिल तलबगार-ए-तमाशा क्यूँ था | शाही शायरी
dil talabgar-e-tamasha kyun tha

ग़ज़ल

दिल तलबगार-ए-तमाशा क्यूँ था

शोहरत बुख़ारी

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दिल तलबगार-ए-तमाशा क्यूँ था
यानी हसरत-कश-ए-दुनिया क्यूँ था

दिन बहर-ए-हाल गुज़र ही जाते
दिल का एहसान उठाया क्यूँ था

सख़्त बेगाना था लेकिन या-रब
इतना मानूस वो चेहरा क्यूँ था

जुज़ ग़ज़ल ख़ाक था दामन में मिरे
उस ने फिर प्यार से देखा क्यूँ था

वो अगर मेरी रसाई में न था
आईने में कोई वैसा क्यूँ था

आँख को शौक़ कि देखे उस को
दिल का पछतावा कि देखा क्यूँ था

हासिल-ए-बज़्म है परवाने की राख
रात भर शम्अ का चर्चा क्यूँ था

सुब्ह के नाम से घबराता हूँ
जी को रास आया अंधेरा क्यूँ था

सोहबत-ए-गुल-बदनाँ में 'शोहरत'
दिल में काँटा सा खटकता क्यूँ था