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दिल में बंदों के बहुत ख़ौफ़-ए-ख़ुदा था पहले | शाही शायरी
dil mein bandon ke bahut KHauf-e-KHuda tha pahle

ग़ज़ल

दिल में बंदों के बहुत ख़ौफ़-ए-ख़ुदा था पहले

मोज फ़तेहगढ़ी

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दिल में बंदों के बहुत ख़ौफ़-ए-ख़ुदा था पहले
ये ज़माना कभी इतना न बुरा था पहले

राम के राज की तस्वीर थी अपनी धरती
मसलक-ए-फ़िक्र-ओ-अमल उन्स-ओ-वफ़ा था पहले

एक इंसान से बे-वज्ह हो इंसान को बैर
ये वतीरा कभी देखा न सुना था पहले

हिंदू-ओ-मुस्लिम-ओ-ईसाई-ओ-सिख मेल से थे
आपसी प्रेम का उल्फ़त का मज़ा था पहले

क़ौमी यक-जेहती का आदर्श था ये भारतवर्ष
हम ने पैग़ाम-ए-विला सब को दिया था पहले

बादशाह और गदा सब के बराबर थे हुक़ूक़
न्याय में कोई भी छोटा न बड़ा था पहले

रास्त-गोई थी यहाँ ग़ैर-मुक़फ़्फ़ल थे मकाँ
देश में ऐसा भी इक दौर रहा था पहले

देश में फिर से मोहब्बत हो रवादारी हो
काश आ जाए ज़माना जो रहा था पहले

मौजज़न रहता था तूफ़ान-ए-उख़ूवत ऐ 'मौज'
दिल में तूफ़ान मोहब्बत का बसा था पहले