दम-ए-रुख़्सत जो उन से कह के मैं उट्ठा ख़ुदा-हाफ़िज़
लगे झुँझला के वो कहने बहुत अच्छा ख़ुदा-हाफ़िज़
जो मैं जाता हूँ उठ कर फ़ी-अमानिल्लाह कहता हूँ
तिरे मुँह से न ओ काफ़िर कभी निकला ख़ुदा-हाफ़िज़
कहा है किस ने तुम से चूमो-चाटो जा के पत्थर को
तुम्हारे ज़ाहिदो अब देन ओ ईमाँ का ख़ुदा हाफ़िज़
हिफ़ाज़त में वो देखे ग़ैर की तुझ को क़यामत है
कभी जो बद-गुमानी से न हो कहता ख़ुदा-हाफ़िज़
सुना है आज वो बुत ख़ूब ही बन-ठन के आता है
तिरे दिल का अरे ओ 'अंजुम'-ए-शैदा ख़ुदा हाफ़िज़

ग़ज़ल
दम-ए-रुख़्सत जो उन से कह के मैं उट्ठा ख़ुदा-हाफ़िज़
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम