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दम-ए-बर्क़-ओ-बाद होता नफ़स-ए-शरार होता | शाही शायरी
dam-e-barq-o-baad hota nafas-e-sharar hota

ग़ज़ल

दम-ए-बर्क़-ओ-बाद होता नफ़स-ए-शरार होता

मंज़ूर हुसैन शोर

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दम-ए-बर्क़-ओ-बाद होता नफ़स-ए-शरार होता
किसी रंग से तो जीना मुझे साज़गार होता

मुझे उस की बे-रुख़ी का भी जो ए'तिबार होता
मैं दुआ को हाथ उठा कर न गुनाहगार होता

न बला से अश्क थमते न दुआ क़ुबूल होती
मैं ख़ुलूस-ए-बंदगी से तो न शर्मसार होता

वो नक़ाब उठ भी जाता तो नज़र कहाँ से लाते
तिरे रू-ब-रू भी तेरा वही इंतिज़ार होता

ग़म-ए-दोस्ताँ ग़नीमत है वतन से दूर वर्ना
मिरे दिल पे क्या गुज़रती जो मिरा दयार होता

मुझे 'शोर' दे रहे हैं वो फ़रेब-ए-तेज़-गामी
कि जो दो क़दम भी चलते तो न ए'तिबार होता