EN اردو
चराग़-ए-शहर से शम-ए-दिल-ए-सहरा जलाना | शाही शायरी
charagh-e-shahr se sham-e-dil-e-sahra jalana

ग़ज़ल

चराग़-ए-शहर से शम-ए-दिल-ए-सहरा जलाना

फ़रहत एहसास

;

चराग़-ए-शहर से शम-ए-दिल-ए-सहरा जलाना
और उस की लौ से महफ़िल-ए-ख़ाना-ए-दुनिया जलाना

तमाशे क्या दिखाता है मिरा बारूद-ए-हस्ती
तुम्हें मुझ को जलाना है तो फिर ज़िंदा जलाना

बड़े सूरज बने फिरते हो तुम इक रात आ कर
ज़रा मेरा चराग़-ए-मौसिम-ए-सर्मा जलाना

उसे मुझ से बस इतना ही तअ'ल्लुक़ है कि हर रात
चराग़-ए-जिस्म अपना पेश-ए-आईना जलाना

चलो आँखों पे आँखें रख के हम इक साथ रोलें
ये ज़िद छोड़ो बहुत अब हो गया जलना जलाना

जो हर बार अपनी ख़ाकिस्तर से उठ पड़ता है ज़िंदा
तो हम ने 'फ़रहत-एहसास' अब तुझे छोड़ा जलाना