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बिखरती टूटती शब का सितारा रख लिया मैं ने | शाही शायरी
bikharti TuTti shab ka sitara rakh liya maine

ग़ज़ल

बिखरती टूटती शब का सितारा रख लिया मैं ने

सिद्दीक़ मुजीबी

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बिखरती टूटती शब का सितारा रख लिया मैं ने
मिरे हिस्से में जो आया ख़सारा रख लिया मैं ने

हिसाब-ए-दोस्ताँ करते तो हर्फ़ आता तअल्लुक़ पर
उठा रक्खा उसे और गोश्वारा रख लिया मैं ने

जुदाई तो मुक़द्दर थी मुझे एहसास था लेकिन
कफ़-ए-उम्मीद पर फिर भी शरारा रख लिया मैं ने

ज़रा सी बूँद जो रौशन है अब तक ख़ल्वत-ए-दिल में
चराग़-ए-शाम तेरा इस्तिआरा रख लिया मैं ने

मिरी आँखों में जो सय्याल आईनों के टुकड़े हैं
उन्हीं टुकड़ों पे मक़्तल का नज़ारा रख लिया मैं ने

ख़ुशी ख़ैरात कर दी और ज़माने भर के रंज ओ ग़म
मिरे दिल को हुआ जितना गवारा रख लिया मैं ने

मिरी दरिया-दिली ने भर दिया कासा समुंदर का
बदन पर रेत हाथों में किनारा रख लिया मैं ने