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भरी आती हैं हर घड़ी आँखें | शाही शायरी
bhari aati hain har ghaDi aankhen

ग़ज़ल

भरी आती हैं हर घड़ी आँखें

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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भरी आती हैं हर घड़ी आँखें
गोया सावन की हैं झड़ी आँखें

नर्गिस आठ आठ आँसू रोती है
याद कर वो बड़ी बड़ी आँखें

शरर-अफ़्शानी-ए-सरिश्क से रात
थीं मिरी जैसे फुलझड़ी आँखें

जूँ क़लम-रौ रही हैं अश्क-ए-सियाह
देख इस मिस्सी की धड़ी आँखें

'मुसहफ़ी' देख बद बला है वो शोख़
न मिला उस से हर घड़ी आँखें