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भरा कमाल-ए-वफ़ा सें ख़याल का शीशा | शाही शायरी
bhara kamal-e-wafa sen KHayal ka shisha

ग़ज़ल

भरा कमाल-ए-वफ़ा सें ख़याल का शीशा

सिराज औरंगाबादी

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भरा कमाल-ए-वफ़ा सें ख़याल का शीशा
कि होए बद्र सें पूरा हिलाल का शीशा

वो ख़ुश-दहन की जुदाई सें नर्म गुलशन में
हर एक ग़ुंचा है रंग-ए-मलाल का शीशा

ख़याल-ए-आरिज़-ए-गुल-रंग की तजल्ली सें
है आइना अरक़-ए-इंफ़िआ'ल का शीशा

तमाम बू-क़लामूनी का है तजल्ली-गाह
नहीं ख़ुदाई में दिल की मिसाल का शीशा

चमन में आज़िम-ए-होली है वो बसंती-पोश
हुआ है ग़ुंचा-ए-लाला गुलाल का शीशा

ख़ुशी सें चर्ख़ में है आफ़्ताब की मानिंद
मिला जिसे मय-ए-नूर-ए-जमाल का शीशा

नबी की आल का अहवाल सुन हुआ पुर-ख़ूँ
'सिराज' दिल है मिरा रंग-ए-आल का शीशा