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बे-रंग बड़े शहर की हस्ती भी वहीं थी | शाही शायरी
be-rang baDe shahr ki hasti bhi wahin thi

ग़ज़ल

बे-रंग बड़े शहर की हस्ती भी वहीं थी

फ़रहत एहसास

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बे-रंग बड़े शहर की हस्ती भी वहीं थी
इक रंग उड़ाती हुई तितली भी वहीं थी

बाज़ार के जादू की न थी काट मिरे पास
जो चीज़ बुरी थी वही अच्छी भी वहीं थी

बस इक तिरा चेहरा ही न था महफ़िल-ए-गुल में
बेला भी था चम्पा भी चमेली भी वहीं थी

इस बाढ़ में करता था जहाँ भी मैं किनारा
अंदर से उबलती मिरी नद्दी भी वहीं थी

सैलाब-ए-बदन उस का जो आया तो गया मैं
हर चंद मिरे जिस्म की कश्ती भी वहीं थी

ऐ इश्क़ जहाँ तू ने मुझे जम्अ किया था
मिट्टी मिरी आख़िर को बिखरनी भी वहीं थी

अफ़सोस गई क़ब्र भी 'एहसास'-मियाँ की
ये क़ब्र जहाँ थी मिरी मिट्टी भी वहीं थी