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बार तुझ हिज्र का भारी है ख़ुदा ख़ैर करे | शाही शायरी
bar tujh hijr ka bhaari hai KHuda KHair kare

ग़ज़ल

बार तुझ हिज्र का भारी है ख़ुदा ख़ैर करे

सिराज औरंगाबादी

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बार तुझ हिज्र का भारी है ख़ुदा ख़ैर करे
रात-दिन नाला-ओ-ज़ारी है ख़ुदा ख़ैर करे

सख़्ती-ए-ग़म सें मिरे दिल का लहू पानी हो
चश्म-ए-गिर्यां सती जारी है ख़ुदा ख़ैर करे

कब मिरे चाँद के आने सें उजाला होगा
हिज्र की रात अँधारी है ख़ुदा ख़ैर करे

चश्म-ए-ख़ूँ-रेज़ तिरी की है अजब तुंद-निगाह
हू-ब-हू ऐन कटारी है ख़ुदा ख़ैर करे

दिल-ए-पुर-आह सीं मेरे वो सनम डरता नहीं
काले नागों की पिटारी है ख़ुदा ख़ैर करे

बिस्मिल-ए-इश्क़ कूँ हरगिज़ नहीं उम्मीद-ए-हयात
ज़ख़्म उस तेग़ का कारी है ख़ुदा ख़ैर करे

आश्ना शो'ला-ए-दूरी सें हुआ जान-ए-'सिराज'
काह कूँ आग सें यारी है ख़ुदा ख़ैर करे