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अय्याम सिर्फ़ शाम-ओ-सहर हो के रह गए | शाही शायरी
ayyam sirf sham-o-sahar ho ke rah gae

ग़ज़ल

अय्याम सिर्फ़ शाम-ओ-सहर हो के रह गए

फ़रहत एहसास

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अय्याम सिर्फ़ शाम-ओ-सहर हो के रह गए
कैसे अजीब लोग थे घर हो के रह गए

हम को पसंद आ गया साहिल का मशवरा
कश्ती की लकड़ियाँ थे शजर हो के रह गए

मिट्टी के इस मकान ने धोका दिया हमें
सहरा-नवर्द ख़ाक-बसर हो के रह गए

आँखें झपक के रह गईं दिल की वफ़ात पर
सैलाब सिर्फ़ दीदा-ए-तर हो के रह गए

पहले तो अपने पाँव ज़मीं से जुदा हुए
फिर यूँ हुआ कि शहर-बदर हो के रह गए